Monday, March 2, 2020

impact-of-british-rule-on-indian-economy

प्रस्तावना
यहाँ पर मैं ‘राजीव अहीर’ की पुस्तक ‘आधुनिक भारत का इतिहास’ से कुछ मुख्य बिंदु लिख रहा हूँ ताकि आप अपने दिमाग में एक खाँचा खींच सके |
भारतीय अर्थव्यवस्था पर ब्रिटिश शासन का विस्तृत प्रभाव का वर्णन निम्नानुसार है —
अनौद्योगीकरण – भारतीय हस्तशिल्प का ह्रास
  • अंग्रेजी माल का भारतीय बाजार में आने से भारतीय हस्तशिल्प का भारत में ह्रास हुआ ,जबकि कारखानों के खुलने से यूरोपीय बाजार में भारतीय हस्तशिल्प को नुकसान हुआ |
  • भारत में अनेक शहरों का पतन तथा भारतीय शिल्पियों का गांव की तरफ पलायन का मुख्य कारण अनौद्योगीकरण ही था |
  • भारतीय दस्तकारों ने अपने परंपरागत व्यवसाय को त्याग दिया व गांव में जाकर खेती करने लगे |
  • भारत एक सम्पूर्ण निर्यातक देश से सम्पूर्ण आयतक देश बन गया |
  • कृषकों की बढ़ती हुई दरिद्रता
    कृषकों की बढ़ती हुई दरिद्रता के मुख्य कारण थे —
  • जमींदारों के द्वारा शोषण |
  • जमीन की उर्वरता बढ़ाने में सरकार द्वारा प्रयाप्त कदम न उठाया जाना|
  • ऋण के लिए सूदखोरो पर निर्भरता |
  • अकाल व अन्य प्राकृतिक आपदा |
  • पुराने जमींदारों की तबाही तथा नई जमींदारी व्यवस्था का उदय —
    नए जमींदार अपने हितों को देखते हुए अंग्रेजों के साथ रहे और किसानों से कभी भी उनके सम्बन्ध अच्छे नही रहे |
    कृषि में स्थिरता एवं उसकी बर्बादी —
    किसानों में धन , तकनीक व कृषि से सम्बंधित शिक्षा का अभाव था |जिसके कारण भारतीय कृषि का धीरे धीरे पतन होने लगा व उत्पादकता में कमीं आने लगी |
    भारतीय कृषि का वाणिज्यीकरण
    वाणिज्यीकरण और विशेषीकरण को कई कारणों ने प्रोत्साहित किया जैसे मुद्रा अर्थव्यवस्था का प्रसार ,रूढ़ि और परंपरा के स्थान पर संविदा और प्रतियोगिता ,एकीकृत राष्ट्रिय बाजार का अभ्युदय,देशी एवं विदेशी व्यपार में वृद्धि ,रेलवे एवं संचार साधनों से राष्ट्रीय मंडी का विकास एवं अंग्रेजी पूंजी के आगमन से विदेशी व्यपार में वृद्धि |
    भारतीय कृषि का वाणिज्यीकरण का प्रभाव—
  • कुछ विशेष प्रकार के फसलों का उत्पादन राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए होने लगा |
  • भूमि कर अत्यधिक होने के कारण किसान इसे अदा करने में असमर्थ था और मजबूरन उसे वाणिज्यिक फसलों का उत्पादन करना पड़ता था |
  • कृषि मूल्यों पर विदेशी उतार चढ़ाव का भी प्रभाव पड़ने लगा |
  • आधुनिक उद्योगों का विकास
    19 वीं शताब्दी में भारत में बड़े पैमाने पर आधुनिक उद्योगों की स्थापना की गई , जिसके फलस्वरूप देश में मशीनी युग प्रारम्भ हुआ |भारत में पहली सूती वस्त्र मिल 1853 में कावसजी नानाभाई ने बम्बई में स्थापित की और पहली जूट मिल 1855 में रिशरा में स्थापित किया गया |आधुनिक उद्योगों का विकास मुख्यतः विदेशियों के द्वारा किया गया |
    विदेशियों का भारत में निवेश करने के मुख्य कारण थे —
  • भारत में सस्ते श्रम की उपलब्धता|
  • कच्चे एवम तैयार माल की उपलब्धता|
  • भारत एवम उनके पडोसी देशों में बाजार की उपलब्धता|
  • पूंजी निवेश की अनुकूल दशाएं|
  • नौकरशाहियों के द्वारा उद्योगपतियों को समर्थन देने की दृढ इच्छाशक्ति|
  • कुछ वस्तुओं के आयत के लाभप्रद अवसर|
  • आर्थिक निकास —
    भारतीय उत्पाद का वह हिस्सा , जो जनता के उपभोग के लिए उपलब्ध नहीं था तथा राजनितिक कारणों से जिसका प्रवाह इंग्लैंड की ओर हो रहा था ,जिसके बदले में भारत को कुछ भी प्राप्त नहीं होता था ,उसे ही आर्थिक निकास कहा गया |दादा भाई नौरोजी ने सर्वप्रथम अपनी पुस्तक ‘पावर्टी एंड अनब्रिटिश रूल इन इंडिया’ में आर्थिक निकास की अवधारणा प्रस्तुत की |
    आर्थिक निकास के तत्व —
  • अंग्रेज प्रशासनिक एवं सैनिक अधिकारियों के वेतन |
  • भारत के द्वारा विदेशों से लिए गए ऋण का ब्याज|
  • नागरिक एवं सैन्य विभाग के लिए विदेशों से खरीदी गई वस्तुएं|
  • नौवहन कंपनियों को की गई अदायगी तथा विदेशी बैंकों तथा बिमा कंपनियों को दिया गया धन|
  • गृह व्यय तथा ईस्ट इंडिया कंपनी के भागीदारों का लाभांश|

  • अकाल एवं गरीबी

    प्राकृतिक विपदाओं ने भी किसानों को गरीब बनाया | अकाल के दिनों में चारे के आभाव में पशुओं की मृत्यु हो जाती थी |पशुओं व संसाधनों के आभाव में कई बार किसान खेती ही नही कर पाते थे |

    औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था की राष्ट्रवादी आलोचना —

    औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था की राष्ट्रवादियों ने निम्न तरीके से आलोचना की —
  • औपनिवेशिक शोषण के कारण ही भारत दिनोंदिन निर्धन होता जा रहा है|
  • गरीबी की समस्यां और निर्धनता में वृद्धि हो रही थी |
  • ब्रिटिश शासन की व्यपार,वित्त ,आधारभूत विकास तथा व्यय की नीतियाँ साम्राज्यवादी हितों के अनुरूप है |
  • भारतीय शोषण को रोकने एवं भारत की स्वंत्रत अर्थव्यवस्था को विकसित करने की मांग की गई |
  • इन आलोचकों में प्रमुख थे -दादाभाई नौरोजी , गोपाल कृष्ण गोखले ,जी सुब्रह्मण्यम अय्यर , महादेव गोविन्द रानाडे ,रोमेश चंद्र दत्त , पृथवीशचंद रॉय आदि |

    education-british-era

    ग में एक खाँचा खींच सके |

    भारत में शिक्षा का विकास

    अंग्रेज़ो के द्वारा भारत में शिक्षा के विकास की शुरुआत 1781 में वारेन हेस्टिंग्स के द्वारा कलकत्ता मदरसा की स्थापना से हुई |इसका उद्देश्य मुस्लिम कानूनों तथा इससे सम्बंधित अन्य विषयों की शिक्षा देना था |इसके उपरांत 1791 में जोनाथन डंकन के प्रयत्नों से बनारस में संस्कृत कॉलेज की स्थापना की गई जिसका उद्देश्य हिन्दू विधि एवं दर्शन का अध्ययन करना था | 1800 में लार्ड वैलेजली के द्वारा फोर्ट विलियम की स्थापना की गई , जहाँ अधिकारियों को विभिन्न भारतीय भाषाओं तथा विभिन्न भारतीय रीति रिवाज़ों की शिक्षा दी जाती थी |
    इन सब कॉलेजो में शिक्षा की पद्धति का ढांचा इस प्रकार तैयार किए गए की कंपनी को ऐसे शिक्षित भारतीय नियमित तौर पर उपलब्ध कराए जा सके जो शास्त्रीय व अन्य स्थानीय भाषा के ज्ञाता हो तथा कंपनी के क़ानूनी प्रशासन में उसे मदद कर सके |
    यह वही समय था जब प्रबुद्ध भारतीयों एवं मिशनरियों ने सरकार पर आधुनिक ,धर्मनिरपेक्ष ,एवं पाश्चात्य शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए दबाव डालना प्रारम्भ कर दिया क्योंकि —
  • प्रबुद्ध भारतीयों ने निष्कर्ष निकाला की पाश्चात्य शिक्षा के माध्यम से ही देश की सामाजिक ,राजनितिक व आर्थिक दुर्बलता दूर किया जा सकता है |
  • मिशनरियों ने यह निष्कर्ष निकाला की पाश्चात्य शिक्षा के प्रचार से भारतीयों को अनेक परंपरागत धर्म में आस्था समाप्त हो जाएगी तथा वह ईसाई धर्म ग्रहण कर लेंगे |
  • 1813 के चार्टर एक्ट से प्रशंसनीय शुरुआत
    इस एक्ट के द्वारा पहली बार भारत में स्थानीय विद्वानों को प्रोत्साहित करने तथा देश में आधुनिक विज्ञान के ज्ञान को प्रारम्भ एवं उन्नत करने जैसे उद्देश्यों को रखा गया | और इसके लिए कंपनी के द्वारा एक लाख रुपए की राशि स्वीकृत की गई |सरकार ने कलकत्ता ,आगरा और बनारस में तीन संस्कृत कॉलेज स्थापित किए |
    आंग्ल-प्राच्य विवाद
    लोक शिक्षा की सामान्य समिति में शिक्षा को लेकर दो मत थे –एक प्राच्य शिक्षा व दूसरे आंग्ल शिक्षा के समर्थक थे |गवर्नर जनरल की कार्यकारणी परिषद् के सदस्य लार्ड मैकाले ने आंग्ल शिक्षा का समर्थन किया …
    लार्ड मैकाले का स्मरण पत्र –1835 में मैकाले ने कहा कि सरकार के सीमित संसाधनों के मद्देनज़र पाश्चात्य विज्ञान एवं साहित्य की शिक्षा के लिए माध्यम के रूप में अंग्रेजी भाषा ही सर्वोत्तम है —
    इसका प्रभाव —
  • सरकार ने स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी बना दिया गया |
  • बड़े पैमाने पर स्कूलों और कॉलेजों कि स्थापना कि गई व जनसाधारण के शिक्षा की उपेक्षा की गई |
  • सरकार की योजना समाज के उच्च एवं मध्य वर्ग के एक तबके को शिक्षित कर एक ऐसी श्रेणी बनाना था जो रक्त एवं रंग से भारतीय हो पर अपने विचार नैतिक मापदंड ,प्रज्ञा एवं प्रवृति से अंग्रेज हो |और यह श्रेणी सरकार तथा जनसाधारण के बीच द्विभाषिये की भूमिका निभा सके |इस प्रकार पाश्चात्य विज्ञान तथा साहित्य का ज्ञान जनसाधारण तक पहुच जाएगा | इस सिद्धान्त को विप्रेषण सिद्धान्त के नाम से जाना गया |
    थॉमसन के प्रयास
  • थॉमसन ने (1843 – 53 ) ग्राम शिक्षा की एक विस्तृत योजना बनाई |अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा देने वाले छोटे छोटे स्कूलों को बंद कर दिया गया |
  • एक शिक्षा विभाग का गठन किया गया |
  • गॉंव के स्कूल में कृषि विज्ञान तथा क्षेत्रमिती जैसे उपयोगी विषयों का अध्ययन प्रारम्भ किया गया | इस शिक्षा के लिए माध्यम देशी भाषा को चुना गया |
  • इसका उद्देश्य नवगठित राजस्व एवं लोक निर्माण विभाग के लिए शिक्षित व्यक्ति उपलब्ध करना था |
  • चार्ल्स वुड डिस्पैच
    चार्ल्स वुड डिस्पैच जिसे भारतीय शिक्षा का Magna-Karta भी कहा जाता है ,भारत में शिक्षा के विकास से सम्बंधित पहला विस्तृत प्रस्ताव था |
    इस डिस्पैच की प्रमुख सिफारिशें निम्न थी —
  • जनसाधारण के शिक्षा का उत्तरदायित्व सरकार वहन करे |
  • गावँ में देशी भाषाओं में प्राथमिक स्कूल ,जिला स्तर पर आंग्ल देशी भाषाई हाई स्कूल तथा बम्बई ,कलकत्ता व मद्रास में विश्वविद्यालय की स्थापना की जाए |
  • उच्च शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी तथा स्कूल शिक्षा का माध्यम देशी भाषा होनी चाहिए |
  • स्त्री शिक्षा तथा व्यवसायिक शिक्षा पर बल दिया गया तथा तकनिकी विद्यालय एवं अध्यापक प्रशिक्षण संस्थानों की स्थापना की सिफारिश की गई |
  • निजी प्रत्यनों को प्रोत्साहित करने के लिए अनुदान सहायता की पद्धति चलाने की सिफारिश की गई|
  • लोक शिक्षा विभाग की स्थापना की गई |
  • शिक्षा के धर्म निरपेक्षता पर बल दिया गया |
  • इसमें इस बात की घोषणा की गई की शिक्षा नीति का उद्देश्य पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार था |
  • हंटर शिक्षा आयोग
    देश की प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा के स्तर की समीक्षा के लिए सरकार ने W W हंटर के नेतृत्व में एक आयोग बनाया जिसे हंटर शिक्षा आयोग के नाम से जाना जाता है | इस आयोग की सिफारिशें निम्न थी —
  • सरकार को प्राथमिक शिक्षा के सुधार पर विशेष ध्यान देना चाहिए और यह शिक्षा उपयोगी विषयों पर स्थानीय भाषा में होनी चाहिए |
  • प्राथमिक पाठशालाओं का नियंत्रण नवसंस्थापित नगर और जिला बोर्डो को दिया जाना चाहिए |
  • प्राथमिक शिक्षा के दो खंड होने चाहिए —
    साहित्यिक – विश्वविद्यालय शिक्षा के लिए
    व्यवहारिक – व्यवसायिक – व्यपारिक व भविष्य निर्माण के लिए |
  • आयोग ने स्त्री शिक्षा को प्रोत्साहित करने का सुझाव दिया |
  • भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम 1904—
    1902 में सर टॉमस रैली की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया गया जिसका उद्देश्य विश्वविद्यालय की स्थिति का आकलन करना था |आयोग की सिफारिशों पर 1904 में भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम पारित किया गया |
    इस अधिनियम के अनुसार —
  • विश्वविद्यालय को अध्ययन और शोध पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करना चाहिए |
  • विश्वविद्यालय के उपसदस्यों की संख्या कम करनी चाहिए और यह प्रावधान करना चाहिए की उप सदस्य मुख्य रूप से सरकार द्वारा मनोनीत हो |
  • विश्वविद्यालय पर सरकारी नियंत्रण बढ़ा दिया गया |
  • अशासकीय कॉलेजों पर सरकारी नियंत्रण और कड़ा कर दिया गया |
  • विश्वविद्यालय के उत्थान के लिए 5 लाख की राशि स्वीकृत की गई |
  • गवर्नर जनरल को विश्वविद्यालय की क्षेत्रीय सीमाएं निर्धारित करने का अधिकार दिया गया |
  • शिक्षा नीति पर सरकारी प्रस्ताव —
    शिक्षा नीति पर 1913 में अपने प्रस्ताव में सरकार ने अनिवार्य शिक्षा की जबावदेही लेने से इंकार कर दिया किन्तु उसने अशिक्षा को दूर करने की जिम्मेदारी स्वीकार कर ली तथा प्रांतीय सरकार से आग्रह किया कि वे समाज के निर्धन व कमजोर वर्ग के बच्चो को निःशुल्क प्रारंभिक शिक्षा देने के लिए आवश्यक कदम उठाये |
    सैडलर विश्वविद्यालय आयोग
    वर्ष 1917 में सरकार ने M E सैडलर कि अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया जिसका कार्य कलकत्ता विश्वविद्यालय कि समस्याओं का अध्ययन कर इसकी रिपोर्ट सरकार को देना था |
    इस आयोग कि सिफारिशें निम्नानुसार थी —
  • विश्वविद्यालय शिक्षा में सुधार के लिए पहले प्राथमिक शिक्षा में सुधार आवश्यक है |
  • स्कूलों कि शिक्षा 12 वर्ष कि होनी चाहिए |
  • विश्वविद्यालय से सम्बंधित नियम बनाने में कठोरता नही होनी चाहिए |
  • महिला शिक्षा ,अनुप्रयुक्त विज्ञान एवं तकनिकी शिक्षा तथा अध्यापकों के प्रशिक्षण को ज्यादा प्रोत्साहित किया जाना चाहिए |
  • हर्टोग समिति 1929
    शिक्षण संस्थानों के अंधाधुंध वृद्धि के कारण शिक्षा स्तर में आई गिरावट कि समीक्षा करने के लिए फिलिप हर्टोग कि अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया | इस समिति कि प्रमुख सिफारिशें थी –
  • समिति ने प्राथमिक शिक्षा के महत्व पर बल दिया लेकिन अनिवार्यता या शीघ्र प्रसार को अनुचित बताया |
  • समिति ने अपने रिपोर्ट में कहा कि केवल समर्पित विद्यार्थियों को ही उच्चतर एवं उच्च शिक्षा के विद्यालयों में प्रवेश लेनी चाहिए | जबकि सामान्य स्तर के विद्यार्थियों को 8 वीं कक्षा के पश्चात् व्यवसायिक पाठ्यक्रम में दाखिल लेनी चाहिए |
  • विश्वविद्यालय शिक्षा में सुधार के लिए विश्वविद्यालय प्रवेश के नियम अत्यंत कठोर होने चाहिए |
  • मूल शिक्षा कि वर्धा योजना -1937 – कांग्रेस के द्वारा
    1937 में आधार शिक्षा पर राष्ट्रीय नीति बनाने के लिए जाकिर हुसैन की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया |इस समिति के गठन का मूल उद्देश्य ‘गतिविधियों के माध्यम से शिक्षा प्राप्त करना था ‘
    इस योजना के प्रावधान निम्न थे —
  • पाठ्यक्रम में आधार दस्तकारी को सम्मिलित किया जाए |
  • राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था के प्रथम सात वर्ष निःशुल्क एवं अनिवार्य होने चाहिए तथा यह शिक्षा मातृ भाषा में होनी चाहिए |
  • कक्षा 2 से 7 तक की शिक्षा का माध्यम हिंदी होना चाहिए | अंग्रेजी भाषा में शिक्षा कक्षा 8 के पश्चात् ही दी जानी चाहिए |
  • शिक्षा हस्त उत्पादित कार्यों पर आधारित होनी चाहिए , अर्थात मूल शिक्षा की योजना का कार्यान्वयन उपयुक्त तकनीक द्वारा शिक्षा देने के सिद्धान्त पर आधारित होनी चाहिए |
  • शिक्षा की यह योजना नए समाज की नई ज़िन्दगी के लिए नए विचारों पर आधारित थी | इस योजना के पीछे यह भावना थी कि इससे देश धीरे धीरे आत्मनिर्भरता एवं स्वतन्त्रा की ओर बढ़ेगा तथा इससे हिंसा रहित समाज का निर्माण होगा |
    शिक्षा की सार्जेंट योजना -1944
    भारत सरकार के शिक्षा सलाहकार सर जान सार्जेंट की अध्यक्षता में शिक्षा की एक राष्ट्रीय योजना बनाई गई |इस योजना के अनुसार
  • 3-6 वर्ष के आयु समूह के लिए पूर्व प्राथमिक या प्रारंभिक शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए |
  • 6 – 11 वर्ष के बच्चों के लिए अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए |
  • 11 – 17 वर्ष के चुनिंदा बच्चों के लिए उच्च शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए|
  • शिक्षकों के प्रशिक्षण ,शारीरिक शिक्षा तथा मानसिक एवं शारीरिक तौर पर विकलांगों को शिक्षा दिए जाने पर बल दिया गया |
    20 वर्षों में व्यस्कों को साक्षर बना दिया जाए |
  • british-land

    प्रस्तावना
    यहाँ पर मैं ‘राजीव अहीर’ की पुस्तक’आधुनिक भारत का इतिहास’ से कुछ मुख्य बिंदु लिख रहा हूँ ताकि आप अपने दिमाग में एक खाँचा खींच सके|
    भारत में अंग्रेज़ो की भू-राजस्व नीतियां
    ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने आर्थिक व्यय की पूर्ति करने तथा अधिकाधिक धन कमाने के उद्देश्य से भारत की कृषि व्यवस्था में हस्तक्षेप करना प्रारम्भ किया था | कंपनी ने करो के उत्पादन और वसूली के लिए कई नए प्रकार के भू राजस्व बंदोबस्त प्रारम्भ किए |
    मुख्य रूप से अंग्रेज़ो ने भारत में तीन प्रकार की भू -राजस्व पध्दतियां अपनाई–
    जमींदारी ,रैयतवाड़ी,महालवाड़ी
    जमींदारी प्रथा या स्थाई बंदोबस्त
  • गवर्नर जनरल लार्ड कार्नवालिस ,जॉन शोर तथा चार्ल्स ग्रांट की आपसी सहमति से 1790 में ज़मींदारों के साथ 10 वर्ष के लिए एक समझौता किया गया जिसे 22 मार्च 1993 को स्थायी कर दिया गया |इसे ही स्थायी बंदोबस्त कहा गया |
  • यह व्यवस्था बंगाल ,बिहार ,उड़ीसा , उत्तर प्रदेश के बनारस प्रखंड तथा उत्तरी कर्नाटक में लागू किया गया |इस व्यवस्था के तहत ब्रिटिश भारत के कुल क्षेत्रफल का लगभग 19 % भाग सम्मिलित हैं|
  • इस व्यवस्था की निम्न विशेषताएं थी —
  • ज़मींदारों को भूमि का स्थाई मालिक बना दिया गया | उन्हें उनकी भूमि से तब तक पृथक नही किया जा सकता था जब तक वे अपना निश्चित लगान सरकार को देते रहे |
  • किसानों को मात्र रैयत का निचा दर्ज़ा दिया गया तथा उनसे भूमि संबंधी तथा अन्य परंपरागत अधिकारों को छीन लिए गया |
  • जमींदार भूमि के मालिक होने के कारण भूमि को खरीद और बेंच सकते थे |
  • जमींदारों से लगान सदैव के लिए निश्चित कर दिया गया |
  • सरकार का किसानों से कोई प्रत्यक्ष संपर्क नही था |
  • जमींदारों को किसानों से वसूल की गई कुल भू -राजस्व का 10/11 भाग कंपनी को देना होता था ,तथा 1/11 भाग वह स्वयं रखता था |
  • यदि कोई ज़मींदार निश्चित तारीख को भू राजस्व की निर्धारित राशि जमा नही करता तो उसकी जमींदारी नीलाम कर दी जाती थी |
  • इससे कंपनी के आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई |
  • उद्देश्य–
    कंपनी द्वारा भू राजस्व के स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था को लागू करने के मुख्य दो उद्देश्य थे —
  • इंग्लैण्ड की तरह ,भारत में जमींदारों का एक ऐसा वर्ग तैयार करना ,जो अंग्रेजी साम्राज्य के लिए सामाजिक आधार का कार्य कर सके |भारत में फैलते साम्राज्य को देखते हुए अंग्रेजों ने महसूस किया कि भारत जैसे विशाल देश पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए उनके पास एक ऐसा वर्ग होना चाहिए ,जो अंग्रेजी सत्ता को सामाजिक आधार प्रदान करें |इसीलिए अंग्रेजों ने ज़मींदारों का एक ऐसा वर्ग तैयार किया जो कंपनी की लूट खसोट से थोड़ा हिस्सा पाकर संतुष्ट हो जाए तथा कंपनी को सामाजिक आधार प्रदान करें |
  • कंपनी की आय में वृद्धि करना |
  • स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था के लाभ —
    ज़मींदारों को-
  • इस व्यवस्था से सर्वाधिक लाभ ज़मींदारों को हुआ |वे स्थायी रूप से भूमि के मालिक बन गए |
  • लगान की एक निश्चित राशि सरकार को देने के पश्चात काफी बड़ी राशि ज़मींदारों को प्राप्त होने लगी |
  • अधिक आय से जमींदार कालांतर में अधिक समृद्ध हो गए तथा वे सुखमय जीवन व्यतीत करने लगे |बहुत से जमींदार गांव छोड़ कर शहर में बस गए |
  • सरकार को –
  • ज़मींदारों के रूप में सरकार को एक ऐसा वर्ग प्राप्त हो गया जो हर परिस्थिति में सरकार का साथ देने को तैयार था | ज़मींदारों के इस वर्ग ने अंग्रेजी सत्ता को एक सामाजिक आधार प्रदान किया तथा कई अवसरों पर ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध किए गए विद्रोह को कुचलने में सरकार की सहायता की |
  • सरकार के आय में अत्यधिक वृद्धि हो गई |सरकार की आय निश्चित हो गई जिससे अपना बजट तैयार करने में उसे आसानी हो गई |
  • सरकार को प्रतिवर्ष राजस्व की दरें तय करने एवं ठेके देने के झंझट से मुक्ति मिल गयी|
  • कंपनी के कर्मचारियों को लगान व्यवस्था से मुक्ति मिल गयी ,जिससे वे कंपनी के व्यापार की ओर अधिक ध्यान दे सके | उसके प्रशासनिक व्यय में भी कमी आयी और प्रशासनिक कुशलता बढ़ी |
  • अन्य को —
  • राजस्व में वृद्धि की संभावनों के कारण जमींदारों ने कृषि में स्थायी रूप से रूचि लेना प्रारम्भ कर दिया तथा कृषि उत्पादन में वृद्धि के अनेक उपाए किए जिससे कृषि की उत्पादकता में वृद्धि हुई |
  • कृषि में उन्नति होने से व्यापार एवं उद्योग में प्रगति हुई |
  • जमींदारों से न्याय एवं शांति स्थापित करने की जिम्मेदारी छीन ली गयी |जिससे उनका ध्यान मुख्यतः कृषि के विकास में लगा तथा इससे सूबों की आर्थिक सम्पन्नता में वृद्धि हुई |
  • सूबों की आर्थिक सम्पन्नता से सरकार को लाभ हुआ |

  • हानियां —
  • इस व्यवस्था में सबसे अधिक हानि किसानों को हुई इससे उन भूमि संबंधी तथा अन्य परंपरागत अधिकार छीन लिए गए तथा वे केवल खेतिहर मज़दूर बन कर रह गए |
  • किसानों को जमींदारों के अत्याचारों व शोषण का सामना करना पड़ा तथा वे पूर्णतया जमींदारों की दया पर निर्भर हो गए |
  • वे जमींदार ,जो राजस्व वसूली की उगाही में उदार थे , भू-राजस्व की उच्च दरें सरकार को समय पर नहीं अदा कर सके , उन्हें बेरहमी के साथ बेदखल कर दिया गया तथा उनकी जमींदारी की नीलामी कर दी गयी |
  • जमींदारों के समृद्ध होने से वे विलासतापूर्ण जीवन व्यतीत करने लगे जिससे सामाजिक भ्रष्टाचार में वृद्धि हुई |
  • स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था ने कालांतर में राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष में भी हानि पहुँचाई |जमींदारों का यह वर्ग स्वतंत्रता संघर्ष में अंग्रेज़ भक्त बना रहा तथा कई अवसरों पर तो उसने राष्ट्रवादियों के विरुद्ध सरकार की मदद की |
  • इस व्यवस्था से किसान दिनोंदिन निर्धन होते गए तथा उनमे सरकार और जमींदारों के विरुद्ध असंतोष फैलने लगा |
  • इस व्यवस्था से सरकार को भी हानि हुई क्योंकि कृषि उत्पादन में वृद्धि के साथ साथ उनके आय में कोई वृद्धि नही हुई तथा संपूर्ण लाभ केवल ज़मींदारों को ही प्राप्त होता रहा |
  • इस प्रकार यह स्पस्ट है की स्थायी बंदोबस्त से सर्वाधिक लाभ जमींदारों को हुआ|यद्दपि सरकार की आय भी बढ़ी लेकिन अन्य दृष्टिकोण से इसमें लाभ के बजाए हानि अधिक हुई |
  • रैयतवाड़ी व्यवस्था
  • मद्रास के गवर्नर जनरल टॉमस मुनरो द्वारा 1920 में रैयतवाड़ी व्यवस्था को प्रारम्भ किया गया |
  • इस व्यवस्था को मद्रास ,बम्बई तथा असम के कुछ भागों में लागू किया गया |इसे लागू करने में बम्बई के गवर्नर एलफिन्सटन ने महत्वपूर्ण योगदान दिया |
  • इस व्यवस्था में किसानों को भूमि का स्वामी बना दिया गया |किसान व्यक्तिगत रूप से सरकार को लगान अदा कर सकते थे |
  • इस प्रणाली में भू राजस्व का निर्धारण भूमि के क्षेत्रफल के आधार पर किया जाता था |
  • इस व्यवस्था का उद्देश्य बिचौलिओं के वर्ग को समाप्त करना था | इस व्यवस्था के अन्तर्गत 51 % भूमि आई |
  • इस व्यवस्था का सबसे बड़ा नुकसान यह था कि लगान दर काफी अधिक थी (लगभग 50 %)और समय से लगान न देने पर किसानों कि जमीन छीन ली जाती थी |
  • महलवाड़ी पद्धति —
  • लार्ड हेस्टिंग्स के काल में ब्रिटिश सरकार ने भू राजस्व कि वसूली के लिए भू राजस्व व्यवस्था का संसोधित रूप लागू किया ,जिसे महलवाड़ी बंदोबस्त कहा गया |यह व्यवस्था मध्य प्रान्त ,पंजाब एवं आगरा में लागू की गयी |इस व्यवस्था के अन्तर्गत 30% भूमि आई |
  • इस व्यवस्था में भू राजस्व का बंदोबस्त एक पुरे गांव या महाल में जमींदारों या उन प्रधानों के साथ किया गया जो सामूहिक रूप से पुरे गांव या महाल के प्रमुख होने का दावा करते थे |किसान लगान महाल के प्रमुख के पास जमा करते थे , तदुपरांत महाल प्रमुख लगान सरकार को देती थी |
  • महाल प्रमुख को यह अधिकार था की वह लगान न देने वाले किसानों को भूमि से बेदखल कर सकते थे |इस व्यवस्था में लगान का निर्धारण महाल या संपूर्ण गांव के उत्पादन के आधार पर किया जाता था |
  • दोष
  • महलवाड़ी बंदोबस्त का सबसे प्रमुख दोष यह था की इसने महाल के मुखिया या प्रधान को अत्यधिक शक्तिशाली बना दिया |यदा कदा मुखिया के द्वारा इस शक्ति का दुरूपयोग किया जाता था |
  • इस व्यवस्था के आने से सरकार और किसानों के बीच प्रत्यक्ष सम्बन्ध बिलकुल समाप्त हो गए |

    peasantsrevolts-1857-1947

    उपनिवेशवाद के अधीन भारतीय कृषि व्यवस्था
      अंग्रेज़ो द्वारा भारतीय कृषि में व्यापक परिवर्तन किए जाने से देश के कृषि जगत में हलचल पैदा हो गई तथा भारतीय कृषक निर्धनता की बेड़ियों से जकड़ गए। उपनिवेशवाद के अधीन भारतीय कृषि की निर्धनता के निम्न प्रमुख कारण थे —
    • उपनिवेशवादी आर्थिक नीतियां।
    • भारतीय हस्तशिल्प के विनाश से भूमि पर अत्यधिक दबाव।
    • नयी भू- राजस्व व्यवस्था तथा उपनिवेशवादी प्रशासनिक एवं न्यायिक व्यवस्था।
    • भारतीय कृषक लगान की ऊंची दरों ,अवैध करों ,भेदभाव पूर्ण बेदखली एवं ज़मींदारी क्षेत्रों में बेगार जैसी बुराइयों से त्रस्त थे।रैयतवाड़ी क्षेत्रों में सरकार किसानों से लगभग 50 % कर लेती थी। इन कठिनाइयों के बोझ से दबे किसान ,अपनी जीविका के एकमात्र साधन को बचाने के लिए महाजनों से ऋण लेने हेतु विवश हो जाते थे। ये महाजन उन्हें अत्यंत ऊंची दरों पर ऋण देकर उन्हें ऋण के जाल में फांस लेते। अनेक अवसरों पर किसानों को अपनी भूमि एवं पशु भी गिरवी रखने पड़ते थे। कभी – कभी ये सूदखोर या महाजन किसानों की गिरवी रखी गयी संपत्ति को भी जब्त कर लेते थे। इन सभी कारणों से कृषक धीरे धीरे निर्धन, लगानदाता व मज़दूर बन कर रह गए। बहुत से कृषकों ने कृषि कार्य छोड़ दिया , कृषि भूमि रिक्त पड़ने लगी तथा कृषि उत्पादन कम होने लगा।
      कृषकों पर किए जा रहे शोषण ने उन्हें उपनिवेशवादी ताकत के विरुद्ध विरोध करने के लिए मज़बूर कर दिया।
    कुछ प्रारंभिक कृषक आंदोलन–
    नील आंदोलन
      नील आंदोलन की शुरुआत बंगाल में नदियां जिले के गोविंदपुर गांव में किसानों के द्वारा हुआ। दिगंबर विश्वास एवं विष्णु विश्वास के नेतृत्व में किसानों ने विद्रोह करके इस आंदोलन की शुरुआत की।
    पृष्ठभूमि
      यूरोपीय बाजार के मांग की पूर्ति के लिए नील उत्पादकों ने किसानों को नील की खेती के लिए बाध्य किया। जिस उपजाऊ जमीन पर चावल की अच्छी खेती हो सकती थी ,उस पर किसानों की निरक्षरता का लाभ उठाकर झूठे करार द्वारा नील की खेती करायी जाती थी। करार के समय किसानों को मामूली रकम अग्रिम के रूप में दी जाती थी। यदि किसान अग्रिम वापस करके भी शोषण से मुक्ति का प्रयास करता था तो उसे ऐसा नही करने दिया जाता था। इसी के विरोध में किसानों ने विद्रोह किया।
    विद्रोह का प्रभाव
    • सरकार ने विद्रोह का बलपूर्वक दमन शुरू कर दिया।
    • किसानों ने जमींदारों को लगान अदा करना बंद कर दिया।
    • बंगाल के बुद्धिजीवी खुल कर किसानों के पक्ष में सामने आए। जैसे हरिश्चन्द्र मुख़र्जी के पत्र ‘हिन्दू पैट्रियट’ ने किसानों का पूर्ण समर्थन किया। दीनबंधु मित्र ने ‘नील दर्पण’ के द्वारा गरीब किसान के दयनीय स्थिति का वर्णन किया आदि।
    • सरकार ने नील उत्पादन की समस्यायों पर सुझाव देने के लिए नील आयोग का गठन किया। इस आयोग की सिफारिशों के आधार पर सरकार ने एक अधिसूचना जारी की ,जिसमे किसानों को यह आश्वासन दिया गया कि उन्हें नील उत्पादन के लिए विवश नही किया जाएगा तथा सभी सम्बंधित विवाद को संवैधानिक तरीके से हल किया जाएगा।
    पबना विद्रोह
    • बंगाल में ज़मींदारों के द्वारा किसानों पर क़ानूनी सीमा से बहुत अधिक करारोपण किया जाता था और मनमानी कारगुजारियां बड़े पैमाने पर किया जाता था ।इसके विरोध में 1873 -76 के बीच में किसान आंदोलन हुआ जिसे पबना विद्रोह के नाम से जाना जाता है।
    • पबना जिले के यूसुफशाही परगने में 1873 में किसान संघ कि स्थापना कि गई।इस संघ के अधीन किसान संगठित हुए और उन्होंने लगान हड़ताल कर दी और बढ़ी हुई दर पर लगान देने से मना कर दिया। किसानों कि यह लड़ाई मुख्यतः क़ानूनी मोर्चे पर ही लड़ी गई थी।
    • सुरेन्द्रनाथ बनर्जी , आनंद मोहन बोस और द्वारका नाथ गांगुली ने इंडियन एसोसिएशन के मंच से आंदोलनकारियों की मांग का समर्थन किया।
    दक्कन विद्रोह 1875
    • पश्चिमी भारत के दक्कन क्षेत्र में प्रारम्भ इस विरोध का मुख्य कारण रैयतवाड़ी बंदोबस्त के अन्तर्गत किसानों पर आरोपित किए गए भारी कर थे।इन क्षेत्रो में भी किसान करो के भारी बोझ से दबे थे तथा महाजनों के कुचक्र में फंसने की विवश थे।
    • 1864 में अमेरिकी गृह युद्ध के समाप्त हो जाने के बाद कपास की कीमत में भारी गिरावट आई , जिससे महाराष्ट्र के किसान बुरी तरह प्रभावित हुए ,और महाजनों के ऋण का दवाब इनपर बढ़ता चला गया।
    • इस आंदोलन के अन्तर्गत किसानों ने महाजनों का सामूहिक बहिष्कार प्रारम्भ किया।
    • इस आंदोलन के अन्तर्गत किसानों ने महाजनों की दुकानों से खरीदारी करने तथा उनके खेतों में मज़दूरी करने से इंकार कर दिया। नाइयों , धोबियों और चर्मकारों ने भी महाजनों की किसी प्रकार की सेवा करने से इंकार कर दिया। धीरे धीरे यह सामाजिक बहिष्कार कृषि दंगो में परिवर्तित हो गया जिसके फलस्वरूप किसानों ने महाजनों और सूदखोरों के घरों पर हमले किए और ऋण संबंधी कागजात को लुट लिए गए और जला दिए गए।

    1857 के पश्चात किसान आंदोलनों का परिवर्तित रूप —
    • किसान आंदोलन में किसान प्रमुख शक्ति बन कर उभरे तथा अब उन्होंने अपनी मांगों के लिए सीधे लड़ना प्रारम्भ कर दिया।
    • उनकी मांगे मुख्यतः आर्थिक समस्यायों से सम्बद्ध थी।
    • किसानों के मुख्य दुश्मन विदेशी बागान मालिक , जमींदार , महाजन एवं सूदखोर थे।
    • इनके आंदोलन विशिष्ट तथा सीमित उद्देश्यों एवं उनके व्यक्तिगत समस्यायों से सम्बंधित होते थे।
    • इन आंदोलन में उपनिवेशवाद के विरुद्ध आवाज़ नही उठाई गई।
    • इन आंदोलन में निरंतरता तथा दीर्घकालीन संगठन का आभाव था।
    • प्रसार क्षेत्र सीमित थे।
    दुर्बलताएं
    • इन आंदोलनकारियों में उपनिवेशवाद के चरित्र को समझने का आभाव था।
    • इस समय के किसानों में नई विचारधारा का आभाव था तथा उनके आंदोलन में सामाजिक , राजनितिक व आर्थिक कार्यक्रम सम्मिलित नही किए जाते थे।
    • इन संघर्षों का स्वरुप उग्रवादी था।
    • सकारात्मक दृष्टिकोण का आभाव था ।

    20 वीं शताब्दी में कृषक आंदोलन
    20 वीं शताब्दी में कृषक विद्रोह ,पिछली शताब्दी के विद्रोहों से अधिक व्यापक ,प्रभावी ,संगठित व सफल थे।इन आंदोलनों ने भारतीय स्वतंत्रा संघर्ष की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
    कुछ महत्वपूर्ण किसान आंदोलन—-
    किसान सभा आंदोलन
    • होमरूल लीग की गतिविधियों के कारण उत्तर प्रदेश में किसान सभाओं का गठन किया गया। फरवरी 1918 में गौरीशंकर मिश्र ,इंद्रा नारायण द्विवेदी तथा मदन मोहन मालवीय ने उत्तर प्रदेश किसान सभा का गठन किया। इनसे जुड़े कुछ और प्रमुख नेता थे -झिंगुरी सिंह , दुर्गापाल सिंह ,बाबा रामचंद्र , जवाहर लाल नेहरू आदि |इसकी लगभग 500 शाखाएं खोली गई ।
    • राष्ट्रवादी नेताओं में मतभेद के कारण अक्टूबर 1920 में अवध किसान सभा का गठन किया गया। अवध किसान सभा ने किसानों को बेदखल जमीन न जोतने और बेगार न करने की अपील की।
    एका आंदोलन
      1921 में उत्तर प्रदेश के उत्तरी जिलों हरदोई ,बहराइच तथा सीतापुर में किसान एकजुट होकर आंदोलन पर उतर आए।
      इस बार आंदोलन के निम्न कारण थे —
    • उच्च लगान दर।
    • राजस्व वसूली में जमींदारों के द्वारा अपने गई दमनकारी नीतियां।
    • बेगार की प्रथा।
    • इस एका आंदोलन में किसानों को प्रतीकात्मक धार्मिक रीति रिवाज़ों का पालन करने का निर्देश दिया जाता था।
      इस आंदोलन का नेतृत्व निचले तबके के किसानों – मदारी पासी आदि ने किया।
    मोपला विद्रोह
      मोपला केरल के मालाबार तट के मुस्लिम किसान थे , जहाँ जमींदारी के अधिकार मुख्यतः हिंदुओं के हाथों में थी।
      विद्रोह के मुख्य कारण थे–
    • लगान की उच्च दरे।
    • नजराना एवम अन्य दमनकारी तरीके।
    बारदोली सत्याग्रह —
      1926 में गुजरात के सूरत में स्थानीय प्रशासन ने भू – राजस्व की दरों में 30 % वृद्धि की घोषणा की। कांग्रेसी नेताओं व स्थानीय लोगों ने इसका तीव्र विरोध किया। विरोध के उपरांत सरकार ने समस्या के समाधान हेतु बारदोली जांच आयोग का गठन किया। आयोग ने अपने रिपोर्ट में कहा कि भू राजस्व के दरों में की गई वृद्धि अन्यायपूर्ण व अनुचित है।
      प्रमुख बिंदु
    • फरवरी 1926 में बारदोली की महिलाओं ने बल्लभ भाई पटेल को सरदार की उपाधि से विभूषित किया।
    • आंदोलन को संगठित करने के लिए बारदोली सत्याग्रह पत्रिका का प्रकाशन किया गया।
    • आंदोलन के समर्थन में के एम मुंशी तथा लालजी नारंजी ने बम्बई विधानपरिषद की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया।
    • बम्बई में रेलवे हड़ताल का आयोजन किया गया।
    • सरकार ने ब्लूमफील्ड व मैक्सवेल के नेतृत्व में समिति बनाई ,जिन्होंने भू राजस्व को घटाकर 6.03% कर दिया।
    अखिल भारतीय किसान कांग्रेस सभा
      इस सभा की स्थापना 1936 में लखनऊ में की गई। स्वामी सहजानंद सरस्वती इस सभा के अध्यक्ष तथा एन जी रंग सचिव चुने गए। इस सभा ने किसान घोषणा पत्र जारी किया तथा इंदु लाल याज्ञीक के निर्देशन में एक पत्र का प्रकाशन किया गया।
    तेभागा आंदोलन
      यह आंदोलन बंगाल के सबसे प्रमुख कृषक आंदोलनों में से एक था। इस आंदोलन में मांग की गई थी की फसल का दो तिहाई हिस्सा किसानों को दिया जाए। इस आंदोलन में बंगाल किसान सभा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यह आंदोलन बटाईदारों के द्वारा जोतदारों के विरुद्ध चलाया गया था। बंगाल की कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों –मुफ्फर अहमद ,सुनील सेन तथा मोनी सिंह ने इस आंदोलन में मुख्य भूमिका निभाई।

    trade-union

    प्रस्तावना
    यहाँ पर मैं ‘राजीव अहीर’ की पुस्तक’आधुनिक भारत का इतिहास’ से कुछ मुख्य बिंदु लिख रहा हूँ ताकि आप अपने दिमाग में एक खाँचा खींच सके |
    19 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारत में आधुनिक उद्योग धंधों के विकास के साथ श्रमिकों के रोजगार में भी वृद्धि हुई | लेकिन पुरे विश्व के श्रमिकों की तरह ही भारतीय श्रमिकों को कुछ कठिनाइयों का सामना करना पड़ा |इन कठिनाइयों में – कम मजदूरी , कार्य के लंबे घंटे ,कारखानों में आधारभूत सुविधाओं का अभाव आदि प्रमुख थे | भारतीय श्रमिक वर्ग को उपनिवेशवादी राजनितिक शासन तथा विदेशी एवं भारतीय पूंजीपतियों के शोषण का सामना करना पड़ा | इन परिस्थितियों के कारन भारतीय श्रमिक आंदोलन अनिवार्य रूप से राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक हिस्सा बन गया |
    प्रारंभिक प्रयास
    प्रारंभिक राष्ट्रवादी विशेषकर उदारवादी —
  • भारतीय श्रमिकों की मांगों के प्रति उदासीन थे |
  • ब्रिटिश स्वामित्व वाले कारखानों में कार्यरत श्रमिकों और भारतीय स्वामित्व वाले कारखानों में कार्यरत श्रमिकों को अलग अलग मानते थे |
  • वे वर्गीय आधार पर आंदोलन में विभाजन के पक्षधर नही थे |
  • प्रारंभिक राष्ट्रवादियों ने कारखाना अधिनियम 1881 एवं 1891 का कोई समर्थन नही किया |
  • शुरुआती दौड़ के कुछ महत्वपूर्ण प्रयास निम्न थे
  • 1870 में शशीपद बनर्जी ने एक श्रमिक क्लब की स्थापना तथा भारत ‘श्रमजीवी’ नमक समाचार पत्र का प्रकाशन प्रारम्भ किया |
  • 1878 में सोराबजी शापूर्जी बंगाली ने श्रमिकों को कार्य की बेहतर दशाएं उपलब्ध करने के लिए एक विधेयक प्रस्तुत किया,जिसे बाद में बम्बई विधान परिषद ने पारित कर दिया |
  • 1880 में नारायण मेघाजी लोखंडे ने ‘दीनबंधु’ नामक समाचार पत्र का प्रकाशन प्रारम्भ किया तथा बम्बई मिल एवं मिलहैड एसोसिएशन की स्थापना की |
  • 1899 में ग्रेट इंडियन पेनिन्सुलर की प्रथम हड़ताल आयोजित की गई |तिलक ने अपने समाचार पत्रों मराठा एवं केसरी के द्वारा हड़ताल का भरपूर समर्थन किया |
  • स्वदेशी आंदोलन के दौरान श्रमिकों ने विस्तृत राजनितिक गतिविधियों में भागेदारी निभाई |
  • सुब्रह्मण्यम अय्यर एवं चिदंबरम पिल्लई के नेतृत्व में तूतीकोरिन एवं तिरुनेलबेल्लि में हड़तालों का आयोजन किया गया |
  • उस समय का सबसे बड़ा हड़ताल का आयोजन तब किया गया जब बाल गंगाधर तिलक को गिरफ्तार कर उन पर मुकदमा चलाया गया |
  • प्रथम विश्व युद्ध के उपरांत ट्रेड यूनियन आंदोलन
    प्रथम विश्व युद्ध के दिनों एवं उसकी समाप्ति के पश्चात् वस्तुओं के मूल्य में अत्यधिक वृद्धि हुई जिससे निर्यात को बढ़ावा मिला और व्यपारियों को अत्यधिक मुनाफा हुआ लेकिन श्रमिकों की मज़दूरी न्यूनतम ही रही |
    यही वो वक़्त था जब श्रमिकों को व्यापार संघो में संगठित किए जाने की आवश्यकता महसूस किया गया |कुछ अंतरराष्ट्रीय घटनाओं जैसे सोवियत संघ की स्थापना ,कम्युनिस्ट की स्थापना तथा अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की स्थापना जैसी घटनाओं से भारतीय श्रमिक वर्ग में एक नई चेतना का प्रसार हुआ |
    AITUC की स्थापना 1920
    1920 में आल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस की स्थापना की गई | लाल लाजपत रॉय एटक के प्रथम अध्यक्ष तथा दीवान चमनलाल इसके प्रथम महासचिव चुने गए | लाजपत रॉय ने पूंजीवाद को साम्राज्यवाद से जोड़ने का प्रयास किया |उनके अनुसार साम्राज्यवाद एवं सैन्यवाद , पूंजीवाद की जुड़वा संताने हैं |
    एटक से जुड़े कुछ प्रमुख नेता थे सी आर दास , जवाहरलाल नेहरू , सुभाषचंद्र बोस , सी एफ एंड्रयूज ,जे एम सेनगुप्ता , वी वी गिरी , सत्यमूर्ति , सरोजनी नायडू आदि |
    ट्रेड यूनियन अधिनियम 1926
    इस अधिनियम में निम्न बातें कहीं गई —
  • व्यापार संघों की गतिविधियों के पंजीकरण एवं नियमन संबंधी कानूनों की व्यख्या की गई |
  • व्यापार संघों की गतिविधियां को नागरिक एवं आपराधिक गतिविधियों की परिधि से बाहर माना गया |
  • श्रमिक विवाद अधिनियम 1929
    इस अधिनियम में निम्न बातें की गई —
  • श्रमिक विवादों के समाधान हेतु जाँच एवं परामर्श आयोग की स्थापना को अनिवार्य बना दिया गया |
  • रेलवे , डाक ,पानी एवं विधुत संभरण जैसी सार्वजनिक सेवाओं में उस समय तक हड़ताल नही की जा सकती जबतक प्रत्येक श्रमिक लिखित रूप से एक मास पूर्व इसकी सुचना प्रशासन को न दे दे |

  • मेरठ षड्‍यंत्र केस

    मार्च 1929 में सरकार ने 31 श्रमिक नेताओं को बंदी बना लिया तथा मेरठ लेकर उन पर मुकदमा चलाया गया | इन पर आरोप लगाया गया की ये सम्राट को भारत की प्रभुसत्ता से वंचित करने का प्रयास कर रहे थे | इन नेताओं में प्रमुख थे – मुजफ्फर अहमद ,एस ए डांगे,जोगलेकर , फिलिप स्प्राट ,वेन ब्रेडली,शौकत उस्मानी आदि |
    1931 में अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस का विभाजन हो गया |दक्षिण पंथी मध्यममार्गीय नेता एम एन जोशी , वी वी गिरी और मृणाल क्रांति बोस ने एटक से अलग होकर भारतीय ट्रेड यूनियन संघ की स्थापना की |

    revolutioniries1

    प्रस्तावना
    भारत में क्रांतिकारी आतंकवाद का विकास दो चरणों में हुआ | पहला चरण स्वेदेशी आंदोलन के बाद शुरू हुआ और दूसरा चरण लगभग 1920 के आस पास |
    क्रांतिकारी आतंकवाद को पढ़ते समय हम upsc में गत वर्षों में पूछे गए प्रश्नों की प्रकृति के आधार पर अपनी पढाई करेंगे | गत वर्षों में इस टॉपिक से प्रारंभिक परीक्षा में तथ्यात्मक प्रश्न अधिक पूछे जाते है — जैसे क्रांतिकारी लीडर का नाम ,उनसे जुड़ी संस्थाएं ,उनके द्वारा किए गए कार्य व घटनाएं | कौन से क्रांतिकारी किस क्षेत्र से थे ,उनके द्वारा लिखी गई पुस्तक, पत्रिका के नाम आदि |हम इस लेख में इसी के इर्द गिर्द चीज़ों को समझने की कोशिश करेंगे |
    क्रांतिकारी आतंकवाद के विकास का कारण–
    क्रांतिकारी आतंकवाद के विकास के निम्न कारण थे —
  • आतंकवादी राष्ट्रवाद – अर्थात क्रन्तिकारी अपने राष्ट्रवाद को दिखाने के लिए कोई भी रास्ता अपनाने को तैयार थे भले ही वह हिंसा का रास्ता ही क्यों न हो |
  • स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन के असफलता के कारण युवाओं का रुझान आतंकवाद की तरफ गया |
  • युवा अपनी राष्ट्रवादी ऊर्जा की अभिव्यक्ति के लिए क्रन्तिकारी आतंकवाद जैसे मंच से जुड़ गए |
  • उग्रवादियों के उग्र तेवर भी क्रांतिकारी आतंकवाद के उदय में सहायक रहे |
  • क्रांतिकारी गतिविधियां —
    बंगाल में —
    बंगाल में क्रांतिकारियों का प्रथम गुप्त संगठन अनुशीलन समिति था ,जिसका गठन 1902 में किया गया|मिदनापुर में ज्ञानेंद्र नाथ बसु ने इसकी स्थापना की |जबकि कलकत्ता में इसका गठन पी. मित्र ने किया|अनुशीलन समिति से जुड़े अन्य सदस्य थे – जतींद्र नाथ बनर्जी ,बारीन्द्र कुमार घोष एवं भूपेन्द्रनाथ दत्त |बारीन्द्र कुमार घोष एवं भूपेन्द्रनाथ दत्त ने युगांतर नामक पत्रिका निकाला |
    मुजफ्फरपुर षड्‍यंत्र कांड
    1908 में मुजफ्फरपुर जिले के न्यायधीश किंग्सफोर्ड पर खुदीराम बोस व प्रफुल्ल चाकी ने उसके हत्या के उद्देश्य से बम फेंका |लेकिन गलती से बम कैनेडी की गाड़ी पर लग गई जिससे दो महिलाएं मारी गई |इसके बाद प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस पकड़े गए | प्रफुल्ल चाकी ने आत्महत्या कर ली और खुदीराम बोस को फांसी की सजा दी गई |
    अलीपुर षड्‍यंत्र कांड
    सरकार ने मनीकटोला उद्यान एवं कलकत्ता में अवैध हथियारों की तलाशी के लिए अनेक स्थानों पर छापे मारे तथा 34 व्यक्तियों को गिरफ्तार किया | इनमे से दो बंधु अरविन्द घोष तथा बरिंद्र घोष भी शामिल थे|इनपर अलीपुर षड्‍यंत्र कांड का अभियोग चलाया गया |
    महाराष्ट्र –
  • महाराष्ट्र में क्रांतिकारी गतिविधियों का आरम्भ वासुदेव बलवंत फड़के के रामोसी कृषक दल ने किया |इस दल ने सशस्त्र विद्रोह के ज़रिए देश से अंग्रेजों को खदेड़ने की योजना बनाई |अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने संचार सेवा को ठप्प करने का प्रयास किया और आतंकवादी गतिविधियों के लिए अनेक स्थानों पर डकैतियां डाली |
  • बाल गंगाधर तिलक ने लोगों में स्वराज्य के प्रति प्यार और अंग्रेज़ विरोधी भावना जगाने के लिए गणपति त्यौहार और शिवजी त्यौहार मनाया |उन्होंने अपने समाचार पत्र मराठा और केसरी में अनेक पत्र लिखे |
  • महाराष्ट्र के दो भाई दामोदर चापेकर और बालकृष्ण चापेकर ने 1897 में पूना में प्लेग समिति के प्रधान रैंड एवं एयर्स्ट की हत्या कर दी |बाद में चापेकर बंधू पकड़े गए और उन्हें फांसी की सजा दी गई |
  • 1899 में विनायक दामोदर सावरकर और गणेश दामोदर सावरकर ने मित्र मेला का गठन किया , जिससे 1904 में अभिनव भारत की स्थापना हुई |

  • पंजाब –
  • पंजाब में क्रांतिकारी आतंकवाद के उदय में लाला लाजपत राय व अजीत सिंह ने महत्वपूर्ण योगदान दिया | लाला लाजपत राय ने अपने समाचार पत्र पंजाबी’ के द्वारा पंजाब के लोगों की स्थिति एवं अंग्रेजों के शोषण का वर्णन किया |
  • अजीत सिंह ने लाहौर में ‘अंजुमन – ए – मोहिसबान – ए – वतन’ नामक क्रन्तिकारी समिति का गठन किया |तथा ‘भारत माता’ नामक पत्र का प्रकाशन किया |
  • पंजाब के क्रांतिकारी आतंकवाद से जुड़े अन्य व्यक्ति थे –आगा हैदर ,सैयद हैदर रज़ा,भाई परमानन्द ,लालचंद फलक आदि |
  • दिल्ली षड्‍यंत्र केस –
    23 दिसम्बर 1912 को लार्ड हार्डिंग के काफिले पर बम फेंका गया |इस घटना में रास बिहारी बोस तथा सचिन सन्याल की मुख्य भूमिका थी |इस घटना के पश्चात् 13 व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया जिनमे मास्टर अमीरचंद्र ,अवध बिहारी ,दीनानाथ सुल्तान चंद्र ,हनुमंत सहाय ,बसंत कुमार ,बाल मुकुंद , बलराज आदि शामिल थे |इन सब पर दिल्ली षड्‍यंत्र केस के नाम पर मुकदमा चलाया गया |कुछ को फांसी दी गई व शेष को देश निकाला दिया गया |
    क्रांतिकारियों का विदेशों में गतिविधियां —
    कुछ प्रमुख स्थान / देश जहाँ क्रन्तिकारी आतंकवाद की जारी रखा गया —
    इंग्लैण्ड-
    लन्दन में क्रांतिकारी आतंकवाद का नेतृत्व मुख्यतः श्यामा जी कृष्णा वर्मा , विनायक दामोदर सावरकर ,मदनलाल ढींगरा एवं लाला हरदयाल ने किया | श्यामा जी कृष्ण वर्मा ने 1905 में ‘भारत स्वशासन समिति’ की स्थापना की जिसे ‘इंडिया हाउस’ के नाम से भी जाना जाता था |इस संस्था का उद्देश्य अंग्रेज़ सरकार को आतंकित कर स्वराज्य प्राप्त करना था |यहां से एक समाचार पत्र सोशियोलोजिक का प्रकाशन भी प्रारम्भ हुआ |लंदन से सरकारी दमन के कारण श्यामा जी पेरिस तथा बाद में जिनेवा चले गए |श्यामा जी के पश्चात् इंडिया हाउस का कार्य भार विनायक दामोदर सावरकर ने संभाला जहाँ उन्होंने ‘1857 का स्वतंत्रता संग्राम’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक लिखी |
    1909 में मदनलाल ढींगरा ने विलियम कर्जन वाइली की हत्या कर दी |ढींगरा को गिरफ्तार कर फांसी दे दी गई |13 मार्च 1910 में नासिक षड्‍यंत्र केस में सावरकर को गिरफ्तार कर काले पानी की सजा सुनाई गई |
    फ्रांस
    यहां श्री एस आर राणा एवं श्रीमती भीकाजी रुस्तम कामा ने पेरिस से आतंकवादी गतिविधियों को जारी रखा |1906 में श्याम जी कृष्ण वर्मा लन्दन से पेरिस पहुंच गए जिससे इनकी गतिविधियां और तेज़ हो गई|
    अमेरिका तथा कनाडा
    संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा में क्रांतिकारी आंदोलन का नेतृत्व लाल हरदयाल ने किया|1 नवम्बर 1913 को लाल हरदयाल ने सन फ्रांसिस्को में ‘ग़दर पार्टी’ की स्थापना की | विश्व के अनेक भागों में इनकी साख खोली गई |ग़दर दल ने 1857 के विद्रोह की स्मृति में ग़दर नमक साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन भी प्रारम्भ किया |
    जर्मनी
    वीरेंद्रनाथ चटोपाध्याय ने बर्लिन को अपनी गतिविधियों का केंद्र बना लिया |इन्होंने तलवार नामक एक पत्रिका निकाली| बाद में लाल हरदयाल तथा उनके साथी भी अमेरिका से जर्मनी आ गए |

    impact-of-british-rule-on-indian-economy

    प्रस्तावना यहाँ पर मैं ‘राजीव अहीर’ की पुस्तक ‘आधुनिक भारत का इतिहास’ से कुछ मुख्य बिंदु लिख रहा हूँ ताकि आप अपने दिमाग में एक खाँचा खींच...